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VOL. 2, ISSUE 5 (2017)
स्त्री जीवन: दशा एवं दिशा
Authors
निशा वर्मा
Abstract
स्त्री पुरुष समाज के दो अभिन्न अंग हैं। समाज के विकास में पुरुषों की तरह ही स्त्री ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया लेकिन फिर भी स्त्री को पुरुष से कम ही आंका जाता है।
उसे दोयम दर्जे का स्थान दिया जाता है। जिसका मुख्य कारण वर्गीय समाज में जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों का आधिपत्य होना है।पितृसत्त ने न सिर्फ समाज पर बल्कि स्त्री की सोच व उसके दिमाग पर भी अपना आधिपत्य जमा लिया है। परम्परागत भारतीय समाज में स्त्री का कार्य क्षेत्र गृहस्थी रहा है। इस गृहस्थ जीवन में नारी को सदैव पुरुष के अधीन रहना पड़ा है पारिवारिक जीवन में सम्पत्ति पर पूरा अधिकार घर के मुखिया यानि पुरुष का होता है। जन्म लेते ही स्त्री के साथ भेदभाव शुरू हो जाता है। एक ओर तो उसे नवरात्रों में देवी बनाकर पूजा जाता है। वहीं दूसरी ओर उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है पितृसत्तात्मक हमारे इस भारतीय समाज की मानसिकता स्त्री को देह तक ही सीमित रखती पितृसत्तात्मक भारतीय समाज में स्त्री का सुन्दर होना ही आवश्यक माना जाता है। स्त्री क्या पहनेकेसे चले केसे बात करे।इसका निर्णय पुरुष प्रधान समाज ही करता है। विज्ञापनों व फिल्मों आदि में भी स्त्री को मात्र एक देह के रूप में प्रयोग किया जाता है। आज स्त्री एक वस्तु में बदल दी गई है। पुंसवादी व्यवस्था में पुरुष का दर्जा स्त्री से ऊँचा है। वह उसका स्वामी है। पितृसत्ता की यह मान्यता है कि स्त्री को पुरुष के अधीन रहना चाहिए।समाज में जो भी नियम व मान्यताएं निर्मित हुई हैं वह सब पुरुषवादी सोच के अनुसार निर्मित हुई हैं।
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Pages:945-946
How to cite this article:
निशा वर्मा "स्त्री जीवन: दशा एवं दिशा". International Journal of Academic Research and Development, Vol 2, Issue 5, 2017, Pages 945-946
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