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VOL. 2, ISSUE 4 (2017)
समकालीन हिन्दी रंगमंच और मोहन राकेश के नाटक
Authors
सोनिया राठी
Abstract
हर संवेदनशील रचनाकार का साहित्य उसके व्यक्तित्व की पहचान होता है। डाॅ. नगेन्द्र के अनुसार व्यक्ति और उसकी कृति में रक्त का संबंध है, अतएव एक का विश्लेषण दूसरे को साथ लिये बिना असंभव है। मदन मोहन गुगलानी से मोहन राकेश जिस परिवेश और परिस्थिति में ढल कर तैयार हुआ उसकी छाया हम उनकी रचनाओं में देख सकते हैं। मोहन राकेश आधुनिक हिन्दी रंगकर्म की एक विशिष्ट, प्रेरक और प्रखर प्रतिभा थे। उनके नाटकों के तिलिस्म को तोड़ने और उनके वास्तविक महत्त्व को जानने की कुंजी उनके सूक्ष्म, जटिल एवं सम्मोहक रंग-शिल्प में छिपी है। एकाध अपवाद को छोड़कर समकालीन हिन्दी भारतीय रंगमंच का शायद ही कोई उल्लेखनीय निर्देशक या कलाकार होगा जिसने कभी मोहन राकेश का कोई छोटा-बड़ा नाटक न किया हो। मोहन राकेश बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार है। किंतु समकालीन नाटककार के रूप में उनका स्थान सर्वोपरि है। आधुनिक हिन्दी नाटक के विकास यात्रा में ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’ तथा ‘आधे-अधूरे’ ने महत्त्वपूर्ण योगदान निभाया है।
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Pages:678-680
How to cite this article:
सोनिया राठी "समकालीन हिन्दी रंगमंच और मोहन राकेश के नाटक". International Journal of Academic Research and Development, Vol 2, Issue 4, 2017, Pages 678-680
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