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VOL. 2, ISSUE 3 (2017)
वैश्वीकरण और मानवाधिकार संरक्षण
Authors
डाॅ0 रानू शर्मा
Abstract
वैश्वीकरण के इस युग में विश्व के सम्पूर्ण राष्ट्र जनसंचार सूचना प्रौद्यौगिकी और आर्थिक लेन-देन की उदारीपूर्ण प्रक्रिया से लाभान्वित हो रहे हैं। समृद्धि और विकास की मीठी परिकल्पना ने एक दूसरे की जरूरतों का अनुभव ही नहीं कराया बल्कि निर्भर भी बना दिया है। ज्ञान की साझा प्रक्रिया भी आरम्भ हुई है फलस्वरूप तकनीकी जानकारी से लेकर प्रबन्धन, पर्यावरण, पोषण और प्रगति का दौर चल पड़ा है। वैश्वीकरण का उदय 1870 से 1914 के मध्य भी हुआ था। इस काल में मानव समाज के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए भी तत्समय में कुछ राष्ट्रों ने एक दूसरे के पास आना शुरू किया था। तब वैश्वीकरण के मुद्दे अलग थे आज जिस प्रकार अर्थ और सूचना प्रौद्योगिकी वैश्वीकरण का आधार बनीं हुई हैं, उसी प्रकार उस काल की अनिवार्यतायों भी भिन्न प्रकार की थी। मानव के जीवन स्तर से लेकर उसके मूल अधिकारों, सुरक्षा और संरक्षा आदि आधार तत्कालीन अनिवार्यताओं के साथ जुड़े थे, जिसकी प्रतिपूर्ति 10 दिसम्बर 1948 संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में ‘मानवाधिकार संरक्षण‘ को लेकर हुई। वैश्वीकरण के विशद चिन्तन की यह महत्वपूर्ण घटना थी। मानवों पर हो रहे वर्वर अत्याचारों से मुक्त कराने का एक संयुक्त उद्घोष था, जिसमें मानव को प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक अधिकारों को उसे दिलाने का दृढ़ निश्चय व्यक्त किया गया था। 30 अनुच्छेदों के इस आधार संहिता पर विश्व की सकारात्मक सहमति बनी, और मानव को जीने के नैसर्गिक अधिकार, समानता, स्वतन्त्रता, श्रम व्यवस्था, अभिव्यक्ति आदि के लिए सम्पूर्ण विश्व में चर्चा चल पड़ी। गैर सरकारी संगठनों का भी उदय हुआ और ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल‘, ‘ह्यूमन राइट्स‘, ‘रोड क्रास‘ ने मानवाधिकारों के लिए विश्वस्तर पर कार्य शुरू किया, भारत में भी 1993 में मानवाधिकार आयोग का गठन हुआ। लेकिन मानव के नैसर्गिक अधिकारों का प्रभावी संरक्षण नहीं हो पाया। विगत तीस वर्षों से वैश्वीकरण की उपस्थिति का जो परिदृश्य बना है, उसमें शक्तिशाली राष्ट्र दोहरा मानदण्ड अपना रहे है, और निजी स्वार्थों के लिए मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन भी कर रहे हैं। वे अपने ही देश में नहीं, बल्कि अन्य अल्पविकसित या विकासशील देशों में भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सामूहित हत्याऐं, शोषण और अमानवीय कृतय कर रहे हैं। बहुत से देश आज भी श्रमशोषण, दास प्रथा, और अमानवीयता से अपने नागरिकों को मुक्त नहीं करा पाये हैं, वे मानवाधिकार आयोग को भी अपने विरूद्ध समझकर उस पर अंकुश लगाने का कार्य करते हैं, आपको नहीं लगता कि वैश्वीकरण की वर्तमान प्रक्रिया ‘कुछ राष्ट्रों‘ और कुछ लोगों के लिए है। विश्व का बहुत बड़ा मानव समाज आज भी शोषित और पीड़ित होकर अपने मौलिक अधिकारों को भी नहीं प्राप्त कर पा रहा है। आर्थिक उदारीकरण, खुले बाजारवाद और सूचना प्रौद्यौगिकी का विस्तार आखिर विकसित देशों को ही लाभ पहुचा रहा है, उन्हों ने अल्पविकसित और विकाशील देशों को अपना बाजार बनाकर उपभोक्तावाद की संस्कृति का फैलाव किया है, फलस्वरूप इन राष्ट्रों की बहुत बड़ी पूंजी पर भी इनका अधिकार हो गया है। मानव जाने-अनजाने और अधिक जरूरतों की चाह में शोषित हो रहा है। वैश्वीकरण का लाभ सम्पूर्ण मानव समाज को समान रूप से मिलना चाहिये। उसे वैश्विक स्तर की समानता, शिक्षा, स्वतन्त्रता और जीवन स्तर की गांरटी मिलनी चाहिएं धर्म-भेद, जाति-भेद, और देश-भेद के अन्तर को समाप्त किए बिना वैश्वीकरण की सफलता संदिग्ध प्रतीत होती है। विकसित राष्ट्र जब तक पक्षपात पूर्ण हितों को छोड़कर ‘मानव‘ और केवल ‘मानव‘ के हितों को ध्यान में रखकर पूंजी, उद्योग प्रबन्धन और सूचना प्रौद्यौगिकी की प्रयोग नहीं करेंगे, तब तक वैश्वीकरण की प्रक्रिया बेमानी के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगी।‘‘
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Pages:270-272
How to cite this article:
डाॅ0 रानू शर्मा "वैश्वीकरण और मानवाधिकार संरक्षण". International Journal of Academic Research and Development, Vol 2, Issue 3, 2017, Pages 270-272
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